एनडीटीवी के लिये – Shoddy journalism

जनवरी 31, 2009

Appalling journalism. Absolute blasphemy! As I watch the news from home, I am dumbfounded to see Barkha Dutt of NDTV break every rule of ethical journalism in reporting the Mumbai mayhem. Take a couple of instances for example:

In one instance she asks a husband about his wife being stuck, or held as a hostage. The poor guy adds in the end about where she was last hiding. Aired! My dear friends with AK-47s, our national news is helping you. Go get those still in. And be sure to thank NDTV for not censoring this bit of information.
In another instance, a General sort of suggests that there were no hostages in Oberoi Trident. (Clever.) Then, our herione of revelations calls the head of Oberoi, and the idiot confirms a possibility of 100 or more people still in the building. Hello! Guys with guns, you’ve got more goats to slay. But before you do, you’ve got to love NDTV and more precisely Ms. Dutt. She’s your official intelligence from Ground zero.
You do not need to be a journalist to understand the basic premise of ethics, which starts with protecting victims first; and that is done by avoiding key information from being aired publicly—such as but not limited to revealing the number of possible people still in, the hideouts of hostages and people stuck in buildings.

Imagine you’re one of those sorry souls holed-up in one of those bathrooms, or kitchens. A journalist pulls your kin outside and asks about your last contact on national television, and other prying details. In a bout of emotion, if they happen to reveal more details, you are sure going to hell. Remember these are hotels, where in all likelihood, every room has a television. All a terrorist needs to do is listen to Ms. Barkha Dutt’s latest achievement of extracting information from your relative, based on your last phone-call or SMS. And you’re shafted—courtesy NDTV.1

If the terrorists don’t manage to shove you in to your private hell, the journalists on national television will certainly help you get there. One of the criticisms about Barkha Dutt on Wikipedia reads thus:

During the Kargil conflict, Indian Army sources repeatedly complained to her channel that she was giving away locations in her broadcasts, thus causing Indian casualties.

Looks like the idiot journalist has not learnt anything since then. I join a number of bloggers pleading her to shut the f⋅⋅⋅ up.

Update: In fact, I am willing to believe that Hemant Karkare died because these channels showed him prepare (wear helmet, wear bullet-proof vest.) in excruciating detail live on television. And they in turn targeted him where he was unprotected. The brave officer succumbed to bullets in the neck.

Update 2 [28.Nov.2300hrs]: Better sense appears to have prevailed in the latter half of today—either willfully, or by Government coercion2, and Live broadcasts are now being limited to non-action zones. Telecast of action troops and strategy is now not being aired live. Thank goodness for that.

Update 3 [30.Nov.1900hrs]: DNA India reports about a UK couple ask media to report carefully:

The terrorists were watching CNN and they came down from where they were in a lift after hearing about us on TV.

— Lynne Shaw in an interview.

Oh, they have a lame excuse pronouncing that the television connections in the hotel has been cut, and therefore it is okay to broadcast. Like hell!
I’m thinking coercion, since Government has just denied renewing CNN’s rights to air video today; must’ve have surely worked as a rude warning to the Indian domestic channels

एनडीटीवी में बैठे मूर्खों के लिये
किस किस का मुंह बन्द कराओगे बेशर्मो?

असफल सरकार जनता को कानून हाथ में लेने पर बाध्य करती है।

नवम्बर 15, 2008

गृह मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार कश्मीर घाटी से कोयम्बटूर तक इस्लामी जिहादियों के विभिन्न हमलों में ६०,००० से अधिक भारतीय मारे गए जिनमें से अंधिकांशत: हिन्दू थे। राजौरी, पुंछ व डोडा जैसे इलाकों में बसों से यात्रयिों को उतारकर हिन्दुओं को अलग खड़ा होने के लिए कहा गया फिर उन्हें गोली मार दी गई। घाटी से ३,५०,००० से अधिक हिन्दुओं को बेघर होकर अपने ही देश के शरणार्थी बनने पर विवश किया गया। घर बाग-बगीचे छोड़कर अपने परिवार की िस्त्रयों की इज्जत गंवाकर ढाई-ढाई साल के बच्चों को जिहादियों द्वारा अपनी आंखों के सामने मारे जाते देखने के बाद शरणार्थी बनना क्या होता है यह सिर्फ शरणार्थी बनकर ही समझा जा सकता है। मामला यही तक नहीं थमा। रघुनाथ मंदिर, संकट मोचन मंदिर, अक्षरधाम मंदिर जैसे भयानक विस्फोट भी हुए और फिर जयपुर, दिल्ली इत्यादि के बम धमाके।

इस जिहाद के स्पष्टत: घोषित तौर पर हिन्दू केन्दित आघातों के बावजूद पिछले ३० वर्षों के एक तरफा जिहादी युद्ध की प्रतिक्रयिा में एक भी हिन्दू आतंकवादी पैदा नहीं हुआ जो यह कहता कि इन कायर और मतांध जिहादियों को हम अपनी ताकत से ठीक करेंगे। इसका एक कारण यह भी है कि हिन्दू भारत को सिर्फ नदियों, पहाड़ों व नागरिकों का समुच्चय नहीं बल्कि साक्षात जगत जननी माता मानकर इस देश पर और यहां की जमीन पर अपना स्वाभाविक अधिकार मानता है। वह आमने-सामने की उस लड़ाई में धर्म से लड़ते हुए तो विजय प्राप्त कर सकता है जैसे १६ दिसंबर १९७१ में ढाका में या कारगिल युद्ध जीतकर उसने दिखा दिया। लेकिन उसका स्वभाव उस जिहादी या नक्सली युद्ध को वीरता नहीं मानता जो यहां विदेशों से आयातित हुआ है। इस सैन्य परंपरा के वीरभाव में हर देशभक्त मुसलमान, ईसाई व सिख भी शामिल है। रात के अंधेरे में दरवाजा खुलवाकर निर्दोष िस्त्रयों और बच्चों को मारना और फिर उसे धर्म की विजय घोषित करना भारत के स्वभाव का कभी हिस्सा नहीं रहा। वह भगत सिंह की परंपरा का समर्थक है जिसने आतंकवाद का सहारा नहीं लिया था बल्कि विदेशी जुल्मी विचारधारा के अन्याय के खिलाफ युद्ध घोषित कर सैन्य कार्यवाही द्वारा मारे जाने की अपील की थी। वह भागा नहीं। उसने बचने की कोशिश नहीं की।

केवल चुनावी वोट बैंक संतुलन और जिहादी तुष्टीकरण के लिए वर्तन सरकार ने इस हजारों साल पुरानी परंपरा पर हिन्दू आतंकवाद शब्द प्रचलित कर धब्बा लगाने की जो कोशिश की है वह अक्षम्य और गर्हित है। सेकुलर वर्ग अपनी चुनावी आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए इस हद तक गिर जाएगा यह अभी तक उस हिन्दू के लिए अकल्पनीय था, जिसने जन्म से मृत्यु तक के कर्मकाण्ड वाले मंत्रों में ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ और ‘सर्व मंगल मांगल्ये’ की कामना कर स्वयं को पृथ्वी पर सबसे विशिष्ट जीवन पद्धति सिद्ध किया। जो यह मानकर चलता है कि कोई भी, किसी भी पथ का अनुगामी होकर अपने ईश्वर को प्राप्त कर सकता है। यही विश्वास हमें सामी पंथों से भिन्न और विशिष्ट बनाता है।

जिन जिहादी संगठनों ने हजारों स्वदेशी बांधवों को कुरान की आयतें उद्धृत करते हुए तथा अपने संगठनों के नाम ‘लश्कर ए तैयबा’, ‘जैशे मोहम्मद’ और ‘हिजबुल मुजाहिदीन’ रखते हुए मार डाला उनके बारे में उल्लेख करते समय सेकुलर मीडिया व सरकार कहती है कि इन्हें इस्लामी आतंकवादी मत कहो। लेकिन सेकुलर मीडिया व सरकार इतनी गहनता से हिन्दू विद्वेष रखती है कि एक साध्वी की गिरफ्तारी होते ही बहुत उत्साह व उत्सवी उद्वेग के साथ ‘हिन्दू आतंकवादी’, ‘भगवा जिहादी’, ‘सेफरन टेरेरिज्म’ जैसे शब्द शीर्षकों से लेकर समाचार कथ्यों तथा संपादकीयों तक इस्तेमाल किए गए, फलस्वरूप आतंकवादियों को तुरंत राहत मिली। क्योंकि जिस समय बाटला हाउस और जामिया के जिहादियों को दिए जा रहे सेकुलर कवच पर जनता में गुस्सा फैल रहा था, गुवाहाटी से लेकर कश्मीर तक हो रहे बम विस्फोटों से केन्द्र सरकार तथा उसका बहादुर गृहमंत्रालय, हिन्दू संगठनों एवं केसरिया पार्टियों के तीर्व निशाने पर आहत हो रहा था, उस समय अचानक सरकार ‘हिन्दू आतंकवादियों’ के खिलाफ रण में उतर आने की बहादुरी दिखाने लगी तो बाकी सारे मामले सुर्खियों से गायब हो गए।

हुआ क्या? बिना कोई सिद्ध किए जा सकने वाले प्रमाण के बावजूद एक हिन्दू संन्यासिनी की गिरफ्तारी की जाती है, जम्मू के एक अन्य संन्यासी को पुलिस के निशाने पर लिया जाता है, भाजपा नेताओं के निर्दोष चित्रों को अपराध कर्म में लिप्त प्रमाण के रूप में छापा जाता है तथा एक भी प्रमाण दिए बिना हिन्दू संगठनों पर प्रतिबंध की आवाजें उठाई जाती हैं तो परिणाम स्वरूप सरकार को लगता है कि उसने एक ही साथ आक्रामक हिन्दू परिवार को रक्षात्मक बनाकर आरोप लगाने की स्थिति से स्पष्टीकरण देने वाली स्थिति में ला खड़ा किया है। जिहादी हमलों की खबरें भी चर्चा से बाहर हो गयीं।

चुनाव सिर पर हों, सरकार आतंकवादी हमलों से त्रस्त हो, चारों ओर सरकार पर शहीद मोहन चन्द शर्मा जैसे पुलिस अधिकारियों के अपमान के तीर्व आरोप लग रहे हों ऐसी स्थिति में डूबते को जहाज के सहारे के समान ‘हिन्दू आतंकवाद’ का शोशा हाथ में लग जाए तो रक्षात्मक सरकार के लिए इससे बढ़कर और क्या सहारा हो सकता है?

साध्वी प्रज्ञा नारको परीक्षा में भी निर्दोष निकली हैं। आम हिन्दुओं में साध्वी के लिए उपजा सम्मान व समर्थन उन सेकुलरों के लिए खतरे की घंटी है जो जिहादी तुष्टीकरण व वोट बैंक के लिए हिन्दुओं को अपना स्वभाव बदलने पर विवश कर रहे हैं। अंधेरे की लड़ाई अंधेरे से नहीं लड़ी जा सकती। हिन्दुओं पर आतंकवादी लेबल चिपकाकर सिर्फ ओसामा बिन लादेन की मदद हो सकती है भारत की रक्षा नहीं।

हिन्दू समाज स्वभावत: कभी धर्म के आधार पर आतंकवाद करने वाली गतिविधियों का समर्थन नहीं कर सकता। नाथू राम गोडसे ने हिन्दू समाज का जितना अहित किया उसका कोई लेखा-जोखा नहीं कर सका है। पर गांधी विश्व वन्द्य माने गए, आज वे दुनिया में भारत की श्रेष्ठतम पहचान हैं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लाखों स्वयंसेवक प्रतिदिन पढ़े जाने वाले प्रात: स्मरण में सुबह गांधी जी का नाम लेते हैं। जिन इस्लामी देशों में आतंकवाद पनप रहा है वहां की दुर्दशा हिन्दू समाज देखता व समझता है। आज दुनिया भर में हिन्दू उद्योग, व्यापार, प्रौद्योगिकी, विज्ञान, कम्यूटर, इंजीनियरिंग आदि क्षेत्रों में शिखर पर दिखते हैं। यह विचार स्वातं«य, सर्व पंथ समभाव, मैत्री व करुणा के स्वभाव से पैदा वातावरण में ही संभव हो सकता था। अजीम प्रेमजी व शाहरूख खान भी अगर शिखर पर हैं तो उसका कारण बहुसंख्यक हिन्दुओं के औदार्य और सर्वसमावेशी सभ्यता के प्रवाह से पैदा वातावरण है। जहां उपासना पद्धति के आधार पर भेदभाव मान्य नहीं। पाकिस्तान जैसे कट्टरपंथी आतंकवाद समर्थक समाज में अब्दुल कादिर खान जैसे ही लोग हो सकते हैं जिन पर परमाणु चोरी का आरोप लगता है। इस्लामी देश सद्दाम हुसैन जैसे तानाशाह, सऊदी शाह जैसे विलासी या ओसामा जैसे आतंकवादी ही पैदा कर रहे हैं।

लेकिन जब चारों ओर से हिन्दू निराश और हताश होकर कोने में धकेला हुआ महसूस करने लगे और पिछले ३ दशकों में हो रहे जिहादी हमलों के साथ-साथ सेकुलर मीडिया और सरकार के एक तरफा द्वेषपूर्ण हमले भी जुड़ जाएं तो यह बहुत अस्वाभाविक नहीं माना जाना चाहिए कि कुछ ऐसे योजक तो जरूर पैदा होंगे जो अपने समाज की रक्षा के लिए प्रतिक्रयिा में विस्फोटक काम कर बैठें। जब तक सेकुलर और जिहादी अन्याय व अंधा दमन हिन्दुओं पर होगा तब तक ऐसे तत्वों को रोका जाना असंभव है। समाज के इन तत्वों पर किसी संगठन का अंकुश नहीं रहता। ‘ए वेडनस्डे’ फिल्म में नसीरूद्दीन शाह कानूनी काम नहीं करते, पर जनता और देशभक्त पुलिसकर्मियों की सहानुभूति जरूर हासिल कर लेते हैं। क्यों? असफल सरकार जनता को कानून हाथ में लेने पर बाध्य करती है।

यह लेख श्री तरुण विजय द्वारा लिखा गया है.

कांग्रेसी सरकार की मुम्बई एटीएस का सच?

नवम्बर 13, 2008

मुंबई पुलिस के एटीएस के हवाले से आ रही जानकारी ने समझौता एक्सप्रेस में पिछले साल फरवरी में हुए बम धमाकों के रहस्य को गहरा कर दिया है। एटीएस के मुताबिक, गिरफ्तार ले. कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित ने नार्को टेस्ट में स्वीकार किया है कि समझौता एक्सप्रेस में धमाका हमारे लोगों ने किया था। लेकिन इससे पहले हुए एक नार्को टेस्ट इस्लामिक आतंकवादी सिमी सरगना सफदर नागौरी समझौता एक्सप्रेस में सिमी का हाथ कबूल कर चुका है। ब्लास्ट के लिए जिस सूटकेस में विस्फोटक ले जाया गया था, वह इंदौर का बना हुआ था।

27 मार्च को इंदौर में गिरफ्तारी के बाद धार के चीफ जुडिशल मैजिस्ट्रेट की इजाजत से इंदौर पुलिस ने 9-10 अप्रैल को सफदर नागौरी, उसके साथी कमरुद्दीन नागौरी और आमिल परवेज का नार्को टेस्ट करवाया था। कर्नाटक सरकार की फरेंसिक साइंस लैब की ओर से बोअरिंग ऐंड लेडी कर्जन हॉस्पिटल के ऑपरेशन थिएटर में यह टेस्ट हुआ था। टेस्ट के समय डॉक्टरों के अलावा वहां कोई मौजूद नहीं था। इस रिपोर्ट की एक कॉपी नवभारत टाइम्स के पास है।

रिपोर्ट के मुताबिक, सफदर नागौरी ने माना कि उसे यह जानकारी थी कि 8 सितंबर 2006 को हुए मालेगांव धमाकों में कुछ मुस्लिम मेंबर शामिल थे। उसने कहा था कि धमाकों के पीछे सिमी के सदस्य थे। सफदर ने यह भी कहा था कि कमरुद्दीन उसका दोस्त है लेकिन उसने उसे यह नहीं बताया कि समझौता एक्सप्रेस धमाकों में उसका हाथ था। नागौरी के सबसे खास माने जाने वाले कमरुद्दीन ने टेस्ट के दौरान ऐसी ही जानकारी दी थी। उसने कहा था कि अब्दुल रज्जाक ने समझौता एक्सप्रेस धमाकों में भूमिका निभाई थी। अब्दुल रज्जाक नागौरी का खास दोस्त है। उसने समझौता एक्सप्रेस के बारे में सफदर से बात की थी।

बेंगलूर की फरेंसिक साइंस लैबोरेटरी में फरेंसिक साइकॉलजी डिविजन की असिस्टेंट डाइरेक्टर डॉ. एस. मालिनी के दस्तखत से जारी इस रिपोर्ट में इन तीनों ने कई और राज भी खोले।

एटीएस मुंबई ने भी सफदर और उसके साथियों से पूछताछ की थी। 2006 में मालेगांव ब्लास्ट की जांच एटीएस मुंबई ने की थी। उसने इस मामले में 9 लोगों के खिलाफ 21 दिसंबर 2006 को एटीएस कोर्ट में चार्जशीट दायर की थी। 4 लोग फरार बताए गए थे। 22 दिसंबर को गिरफ्तार लोगों में से एक, असरार अहमद ने सरकारी गवाह बनने की अर्जी दी थी। लेकिन उसी दिन महाराष्ट्र सरकार ने यह केस सीबीआई को सौंप दिया। 2 साल से सीबीआई जांच चल रही है। सवाल यह है कि जिस एटीएस की तारीफ आज महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख कर रहे हैं, तब उन्होंने उस पर अविश्वास क्यों किया था? सवाल यह भी है कि जब नागौरी और उसके साथी समझौता एक्सप्रेस में बम धमाकों की बात नार्को टेस्ट में कबूल कर चुके हैं तो फिर ले.कर्नल पुरोहित और प्रज्ञा ठाकुर कैसे इस ब्लास्ट में अपना हाथ स्वीकार कर रहे हैं

नवभारत टाइम्स में अरुण दीक्षित

पुलिस के पास जब कोई सबूत नहीं होता तो उसे नार्को, ब्रेन मैपिंग टैस्ट याद आते हैं

नवम्बर 3, 2008

आरुषी कांड में पुलिस अंधेरे में लठ्ठ चला रही थी उसके पास कोई भी सबूत नहीं था मीडिया की लगात बौछार से त्रस्त यूपी पुलिस ने आरुषी के मां बाप को धर दबोचा. एक दिवंगत बच्ची के संबन्ध नौकर से बताये. उसके मात पिता के संबध अन्य परिवार के मित्रों से बताये. बार बार नार्को टैस्ट और ब्रइन मैपिंग कराया गया और पुलिस बार बार दोहराती रही कि उसके पास सबूत हैं लेकिन बाद में क्या निकला?

पुलिस के पास जब कोई सबूत नहीं होता तो उसे नार्को, ब्रेन मैपिंग टैस्ट याद आते हैं

प्रग्या ठाकुर के मामले में भी महाराष्ट्र की कांग्रेसी सरकार की पुलिस एटीएस के पास सिर्फ यही पता चला है कि ब्लास्त में उस मोटरसाइकिल का उपयोग हुआ है जो प्रग्या ठाकुर द्वारा बेची जा चुकी थी. इसके अलावा कोई सबूत नहीं है. महाराष्ट्र की कांग्रेसी सरकार की पुलिस द्वारा प्रग्या का को नार्को टेस्ट कराया गया था इसमें प्रग्या के खिलाफ कुछ भी साबित नहीं हो पाया है.

अब महाराष्ट्र एटीएस के हाथ पांव फूले हुये हैं और वह हवा में लठ्ठ मार रही है बिल्कुल उसी तरह जिस तरह आरुषी कांड में यूपी पुलिस मार रही है, फिलहाल कांग्रेसी सरकार चाहती है कि मामला थोड़ा खिंचे और राज्य विधान सभाओं में जो चुनाव हो रहे हैं तब तक मामला खिंचता रहे और उसे इसका राज+अनैतिक फायदा मिल सके. इसके लिये महाराष्ट्र की कांग्रेसी सरकार की पुलिस प्रग्या ठाकुर का फिर नार्को, ब्रेन मैपिंग टैस्ट कराना चाहती है. क्योंकि;

पुलिस के पास जब कोई सबूत नहीं होता तो उसे नार्को, ब्रेन मैपिंग टैस्ट याद आते हैं.

जनता की याददाश्त तो बहुत कमजोर है, उसे क्या याद रहेगा कुछ भी

फिलहाल तो कांग्रेस चौकड़ी की मंशा है कि सीरियल ब्लास्ट के बाद भारतीय जनमानश में जो रोष उपजा है वह शांत हो जाये.
क्या हमारी याददाश्त वाकी इतनी कमजोर है?

लालू का इस्तीफा लेने देने का चुनावी नाटक

नवम्बर 2, 2008

लालू यादव और कांग्रेस सरकार ने राज ठाकरे के साथ मिलकर जो चुनावी नाटक खेला है वो अब क्लाइमेक्स पर पहुंचता जा रहा है. अब लालू सारे बिहार के राजनीतिक दलों से इस्तीफा देने के लिये कह रहे हैं ये साफ साफ अपना प्रभुत्व कायम करने की चाल है. लालू का सारा नाटक सिर्फ बिहार में आने वाले लोकसभा चुनाव में बढ़त हासिल करने के लिये था, यह एकदम स्पष्ट हो गया है.

महाराष्ट्र में कांग्रेसी सरकार है और राजठाकरे का नाटक कांग्रेस के साथ मिलकर खेला जा रहा है. लंगड़ी कांग्रेसी सरकार लालू और मुलायम के हत्था टिकाने पर ही सरक रही है और लालू द्वारा कभी भी अपना हत्था सरकाने पर ये सरकार ओंधा कर भरभरा जायेगी. क्या महाराष्ट्र की कांग्रेस-एनसीपी युति लालू की सहमति के बिना ये काम कर सकती हैं?

कानून व्यवस्था बनाना और बनाये रखना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है इसके लिये कांग्रेस-एनसीपी युति की जिम्मेदारी है. लालू और मुलायम की पार्टी इनकी सहयोगी है. टीवी पर चीख पुकारने की नौटंकी करने वाले लालू ने कांग्रेस-एनसीपी युति के खिलाफ क्या किया? सिर्फ अपने घड़ियाली आंसू बहाये, बड़े बड़े नारे लगाये और …

समझो यूपी बिहार वालो, लालू का ये खेल समझो, न समझोगे तो पीछे पछताने के लिये भी कुछ नहीं बचेगा
ये राजनीति नहीं राज-अनीति है, लालू इसमें सिद्दहस्त है.

बिहार की बदहाली के लिये जो जिम्मेदार हैं वही आज मसीहा बन बैठे हैं
हमें अपना भविष्य खुद बनाना होगा, वरना ये गिद्द हमें जिन्दा ही नौंच नौंच कर खा जायेंगे. लालू के खेल को समझो

हरिवंश जी ने बिहार, झारखंड यानी हिंदीपट्टी के छात्रों से जो ईमानदार गुज़ारि की है उस पर ध्यान दो

वरना हम एसे ही गालियां खाते रहेंगे, पिटते रहेंगे.

राज ठाकरे के कांड का असली सूत्रधार लालू यादव है?

नवम्बर 2, 2008

जरा सोचिये कि राज ठाकरे और बिहारी के झगड़े में किसको क्या मिला?
इस झगड़े में जो दो राजनैतिक पार्टियों ने सबसे ज्यादा कमाई की है वो हैं कांग्रेस और लालू यादव की जेबी पार्टी.  राज ठाकरे के पास न तो पहले कुछ था न इस मामले के बाद कुछ हाथ लगने की आशंका है.

महाराष्ट्र में पिछले चुनावों में कांग्रेस और राज ठाकरे पाताल में धसंक गये थे हर जगह बाला साहब ठाकरे की पार्टी ने जबर्दस्त कामयाबी हासिल की थी.  उद्वव ने पिछले साल मी मुम्बईकर करके एक मुहीम चलायी इसके अनुसार जो मुम्बई में है वह मुम्बईकर है.  इस मुहीम को हर वर्ग का समर्थन मिला. यहां तक कि जावेद अख्तर तक ने मी मुम्बईकर कहा. याद होंगे इस मुहीम के विडियो आपको, जैसे विवेक आबरॉय और रितिक रौशन की एड फिल्में.  वो मुहीम आपस में जोड़ने वाली थी.

समय और गुजरने के साथ कांग्रेस और भी पिछे हो गई थी,  एनसीपी की   घड़ी ने भी टिक्टिकाना बन्द कर दिया था.  यही हाल लालू का बिहार में था.  बिहार की गद्दी लालू के परिवार के हाथ से निकल गई थी और वहां नितीश कुमार आ गये थे.  समय के साथ नितीश कुमार की लोकप्रियता बढ़ती जा रही थी.  नितीश के काम के साथ बिहार विकास के रास्ते पर दस्तक देने लगा था.  यदि यही हाल रहते तो लालू की आने वाले लोकसभा चुनाव में कोई पानी भी देने वाला न मिलता. Read the rest of this entry »

क्या बाटला हाउस के आतंकवादियों को छोड़ने की डील फाइनल हो चुकी है?

नवम्बर 1, 2008

कांग्रेस (CON-gress) की सरकार  कुछ दलालों के कब्जे में है और इसका रहना न रहना सिर्फ इन्हीं पर निर्भर है।  ये दलाल चाहते हैं कि बाटला के अपराधी कानून के शिकंजे में न फंसे इसीलिये एसा लग रहा है कि बाटला के आतंकवादियों को बचाने के लिये अन्दर ही अन्दर कोई डील हो चुकी है। Read the rest of this entry »